Saturday, July 11, 2015

vardi

पुलिस कपड़ों के लिहाज से बड़ी जलबेदार नौकरी है । कोई अगर पूरी की पूरी ड्रेस पहनकर आ जाये तो उसकी शख़्सियत भीतर से चाहे जो भी हो,पर बाहर से एक प्रखर आकर्षण पैदा करती है । न जाने पढाई के दिनों में कितने अभ्यर्थी इसी मोह में पुलिस में भर्ती होते जा रहे हैं । इस नौकरी के शिखर पर हम 'भारतीय पुलिस सेवा' के लोग हैं । 'भारतीय' हैं ये बात सभी को माननी ही है ।पुलिस ले दे के बचे हैं ,और रही बात सेवा की तो जैसी भी है दे ही रहे हैं?
कल allahabad high court ने कहा कि पुलिस से बचना जनता के लिए गुंडों से बचने से भी ज्यादा मुश्किल हो रहा है । एक honarable institution की वाणी है सो उसका खंडन तो अवमान होगा ।लेकिन खुद पुलिस को अपनी इज्जत बचाने के लाले पड़े हैं । यदि honarable court को ये पता होता तो टिप्पणी करने में जरूर नरमाई बरतता । पर नरमाई बरत भी कौन रहा है?
क्या हमारा दरोगा सड़क के किनारे पटरी-रेहड़ी बालों पर नरम है?क्या हम अपने दरोगा पर नरम हैं?क्या सरकार हम पर नरम है?क्या सरकार के ऊपर मीडिया नरम है और आखिर में पट्टी चलाने में क्या मीडिया नरम है?!
कोई किसी के ऊपर नरम नहीं । सबको अपने अपने मौकों की दरकार है । पटरी-रेहड़ी लगाने बाले फुटपाथी गरीब को भी कि कब मौका हाथ लगे तो दरोगा जी पर हाथ साफ़ कर लूँ और थाने के कुछ शीशे गमले तोड़ने को मिल जाएँ ।कभी कभी लगता है कि पुलिस की रोबदार ड्रेस को तबदीली की जरूरत है । हमारे अत्याचारी लेकिन institution lover हुक्मरानों ने बड़ी शानदार ड्रेस बनाई । दो दो तरह की टोपियां,तीन तीन चार चार तरह के बेल्टें, तरह तरह के सितारे,जूते और decorations । सोचता हूँ कि काम तो बड़ी साधारण बेश भूसा से चल जाता;इतने टीम टाम की क्या जरूरत रही होगी । पर एक झटके से जो जबाब मिलता है-शायद आईने के सामने खड़े होकर रोज हम अपनी शक्ति और उसके सदुपयोग को याद कर सकें । या शायद इसलिए कि जब जब अपने आत्म गौरव को तलाशने की जरूरत पड़े तो ये कपड़े ये बर्दी हमारे काम आए । पर काम आ रही है क्या?और आ रही है तो किसके काम? इसलिए हृदय तो यही करता है कि इस टीम टाम को ख़त्म किया जाए । जब आचरण असाधारण नहीं तो वस्त्रावरण असाधारण क्यों रहे?हम भी लगोंट बाँध के कूद पडें ताक़ि visible न रहें । समस्या यही विसिविलिटी है ।लेखपाल सिपाही से ज्यादा ख़ुशहाल है,नायब तहसीलदार दारोग़ा जी से ज्यादा प्रसन्नबदन है,और दूसरे प्रशासनिक सहोदर भी हमसे ज्यादा ही खुशहाल जिन्दिगी जीते हुए लगते हैं । कारण यही है कि वो इनविजिबल रहते हुए 'जनसेवा'कर रहे हैं । सरकार को सोचना चाहिए कि visibility का इतना भयानक दंड हमें ही क्यों?
जो विचारे जलबेदार बर्दी के मोह से चिपके हैं,उनका क्या?इस नक्कारे में उनके मंदिम सुरों का क्या!! नियति को भोगना और सत्ता के सर्वग्रासी सुरसा-मुख से बच निकलना...पर क्या बचना आसान है..हनुमान  तो चातुर्य-निपुणता से बच निकले थे ।ये लोग बचेंगे क्या? माननीय न्यायालय अपनी टिप्पणी में ऐसे वदक़िस्मत लोगों पर कुछ नरमदिल शब्द कह देता तो आलंकारिक बर्दी पहनने में कोई कोफ़्त न होती । बरना पिछले दो दिन से पी कैप सर जला रही है!!